किसान आंदोलन का दूसरा चरण: कैसा होगा?

             'संयुक्त किसान मोर्चा' के बयान

             कई सवाल, कुछ जवाब!                


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14 मार्च, 2022 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान (Gandhi Peace Foundation- GPF) में संयुक्त किसान मोर्चा की राष्ट्रीय बैठक हुई। यद्यपि यह बैठक में चुनाव में भागीदारी किए संयुक्त समाज मोर्चा और संयुक्त संघर्ष पार्टी के नेताओं को नहीं बुलाया गया था किंतु वे भी आए।  बैठक के बाद मोर्चा की तरफ से यह बयान जारी किया  गया-- 

★ एमएसपी की गारंटी की मांग को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन का अगला चरण घोषित किया

★ 11 से 17 अप्रैल के बीच किसान मनाएंगे एमएसपी गारंटी सप्ताह

★ लखीमपुर खेरी में अपराधियों को बचाने और बेकसूर किसानों को फंसाने के खिलाफ किसान करेंगे रोष प्रदर्शन

★ तीन महीने बीतने के बाद भी सरकार द्वारा किसान आंदोलन को दिए आश्वासन पर अमल नहीं करने से सरकार की किसान विरोधी नियत जाहिर

संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने राष्ट्रव्यापी अभियान का अगला दौर शुरू करने की घोषणा कर दी है। आज दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान में संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सभी संगठनों की बैठक में सर्वसम्मति से यह फैसला हुआ कि अगले महीने 11 से 17 अप्रैल के बीच एमएसपी की कानूनी गारंटी सप्ताह मना कर राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरुआत की जाएगी। इस सप्ताह के दौरान संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सभी घटक संगठन सभी किसानों को अपने सभी कृषि उत्पाद पर स्वामीनाथन कमीशन द्वारा निर्धारित (C2+50%) न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग उठाते हुए धरना, प्रदर्शन, गोष्ठी का आयोजन करेंगे।

बैठक में लखीमपुर खीरी कांड में चल रही कानूनी प्रक्रिया की समीक्षा कर इस बात पर चिंता जताई गई पुलिस प्रशासन और अभियोक्ता सब मिलकर अपराधियों को बचाने और बेकसूर किसानों को फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। यह आश्चर्य का विषय है कि इतने संगीन मामले में केंद्रीय मंत्री के बेटे को इतनी जल्दी जमानत मिल गई जबकि इसी मामले में फंसाए गए किसान अभी भी जेल में बंद हैं। संयुक्त किसान मोर्चा इस खबर से क्षुब्ध है की मोनू मिश्रा के बाहर निकलने के बाद इस मामले के एक प्रमुख गवाह पर हमला किया गया है। मोर्चे ने तय किया कि इस मामले में कानूनी लड़ाई में कोई ढील नहीं बरती जाएगी और मोर्चे की तरफ से किसानों के परिवारों को पूरी कानूनी मदद दी जाएगी।

मोर्चे ने भारत सरकार द्वारा 9 दिसंबर को संयुक्त किसान मोर्चा को दिए लिखित आश्वासनों की समीक्षा की और यह पाया कि 3 महीने बीत जाने के बाद भी सरकार ने अपने प्रमुख आश्वासनों पर कुछ भी नहीं किया है। एमएसपी पर जो कमेटी बनाने का आश्वासन था उसका नामोनिशान भी नहीं है। हरियाणा को छोड़कर अन्य राज्यों में किसानों के विरुद्ध आंदोलन के दौरान बने केस वापस नहीं लिए गए हैं। दिल्ली पुलिस ने कुछ केसों को आंशिक रूप से वापस लेने की बात कही है लेकिन उसका भी कोई  ठोस सूचना नहीं है। देशभर में रेल रोको की केसों के बारे में भी कुछ नही हुआ है। 

लखीमपुर खेरी कांड पर सरकार की भूमिका और किसान आंदोलन को दिए आश्वासनों पर वादाखिलाफी के मुद्दे को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने 21 मार्च को देशभर में रोष प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लिया है।

मोर्चे ने फिर दोहराया कि 28 और 29 मार्च को ट्रेड यूनियन द्वारा भारत बंद के आह्वान का संयुक्त किसान मोर्चा समर्थन करता है और देश भर में किसान उसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे।

संयुक्त किसान मोर्चा की कोऑर्डिनेशन कमेटी द्वारा बुलाई गई इस राष्ट्रीय बैठक में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, आसाम, त्रिपुरा, उड़ीसा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

जारीकर्ता -

डॉ दर्शन पाल, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, शिवकुमार शर्मा (कक्का जी), युद्धवीर सिंह, योगेंद्र यादव

संयुक्त किसान मोर्चा

ईमेल: samyuktkisanmorcha@gmail.com’

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इस बयान के बाद संयुक्त किसान मोर्चा के ही नाम से चंडीगढ़ से एक दूसरा बयान भी निम्नवत जारी हुआ--

" प्रेस विज्ञप्ति

चंडीगढ़ (14 मार्च)

 संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) की राष्ट्रीय बैठक आज यहां गांधी पीस फाउंडेशन में आयोजित की गई जिसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश आदि जैसे प्रमुख राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले 100 से अधिक सदस्यों ने भाग लिया।

बैठक को अन्य लोगों के अलावा बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चारुनी, सत्यवान, अतुल अनजान कुलवंत सिंह संधू, रुलदू सिंह मनसा, प्रेम सिंह भंगू, कंवलप्रीत सिंह पन्नू, प्रेम सिंह गहलावत, कुलदीप सिंह वाजिदपुर ने संबोधित किया।

बैठक में तीन किसान विरोधी कानूनों को वापस लेने के बाद किसान आंदोलन को निलंबित करने के बाद दिसंबर में लंबित मुद्दों के संबंध में भाजपा सरकार द्वारा दिए गए वादों और लिखित आश्वासन के पूरा न होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

एसकेएम ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर समिति की घोषणा नहीं करने, आंदोलन के दौरान किसानों के खिलाफ दर्ज झूठे मामलों को वापस लेने और लखीमपुर खीरी के किसानों को न्याय से वंचित करने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की, जिन्हें अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा के वाहन से कुचल दिया गया था। 

टेनी, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री।  एसकेएम ने आशीष मिश्रा मामले में गवाह पर हमले और मामले के सबूतों को दबाने और छेड़छाड़ करने के प्रयासों की निंदा की।

एसकेएम ने अपनी अगली बैठक 21 मार्च को लखीमपुर खीरी में आयोजित करने का निर्णय लिया है जहां एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज माफी, लखीमपुर खीरी मामले और मामलों की वापसी के लिए आंदोलन के कार्यक्रम की घोषणा की जाएगी।

एसकेएम ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति के खिलाफ सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा 28 और 29 मार्च को की गई राष्ट्रव्यापी हड़ताल का सर्वसम्मति से समर्थन किया।"

 जारीकर्ता,

 बलबीर सिंह राजेवाल एवं अध्यक्ष-मंडल

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इसके बाद उपर्युक्त संदर्भित एक अन्य बयान संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से दिनाँक 16 मार्च को जारी किया गया जिसमें इस दूसरे बयान को 'समानांतर 'मीटिंग' का बयान कहकर इसे खारिज किया गया। इसे भी पढ़ें और समझने का प्रयास करें कि किसान आंदोलन के आगे की दिशा-दशा क्या होने वाली है। यह तीसरा बयान कुछ इस तरह है--

"संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चला ऐतिहासिक आंदोलन अपने पहले चरण में कामयाबी हासिल कर अब दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा है। तीन काले कानूनों को रद्द करवाने के बाद अब एमएसपी की कानूनी गारंटी हासिल करने के लिए, खेती के कॉर्पोरेट कब्जे के खिलाफ और किसानों की बाकी दीर्घकालिक समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन का नया दौर शुरू हो चुका है। इस दौर में सरकारों का किसान विरोधी रुख और भी खुल-कर सामने आ रहा है। लखीमपुर खीरी में किसानों के हत्यारों को बचाने और बेकसूर किसानों को फंसाने का षड्यंत्र जारी है, केंद्र सरकार 9 दिसंबर को किसानों से किए अपने वादों से मुकर रही है और पिछले दरवाजे से किसान विरोधी कानूनों और समझौतो को लादने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में बेहद जरूरी है कि किसान आंदोलन पहले से भी ज्यादा मजबूती और एकता दिखाते हुए इस चुनौती का सामना करे।

ऐसे नाजुक मोड़ पर इस ऐतिहासिक एकता के सामने खड़ी किसी भी चुनौती का सामना करना होगा। संयुक्त किसान मोर्चा की राष्ट्रीय बैठक में 15 जनवरी को आम सहमति से यह फैसला किया गया था कि इन चुनावों में संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़ा जो भी किसान संगठन पार्टी बनाता है या जो नेता चुनाव लड़ता है, वह संयुक्त किसान मोर्चा में नहीं रहेगा। मोर्चे ने यह भी तय किया था कि जरूरत होने पर इस निर्णय की समीक्षा इन विधानसभा चुनावों के बाद अप्रैल माह में की जाएगी।

जाहिर है इस स्पष्ट फैसले के बाद “संयुक्त समाज मोर्चा” और “संयुक्त संघर्ष पार्टी” के नाम से पंजाब में पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने वाले किसान संगठन और नेता कम से कम अप्रैल तक संयुक्त किसान मोर्चा से बाहर हो गए थे। मोर्चे की हिदायत और चेतावनी के बावजूद चुनाव लड़ने वाले इन संगठनों को पंजाब के किसानों ने पूरी तरह खारिज कर दिया।  मोर्चे की सात सदस्यीय कोऑर्डिनेशन कमेटी ने इस फैसले की समीक्षा का तरीका और मोर्चे के आगामी कार्यक्रम तय करने के लिए 14 मार्च को दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान में सभी संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई थी। लेकिन मोर्चे के फैसले का इंतजार किए बिना श्री बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढूनी के नेतृत्व में “संयुक्त समाज मोर्चा” और “संयुक्त संघर्ष पार्टी” के लोग जबरन मीटिंग स्थल पर पहुंच गए और जोर जबरदस्ती करते हुए मीटिंग हॉल पर कब्जा कर एक समानांतर मीटिंग शुरू कर दी। किसी अप्रिय घटना को टालने के लिए कोऑर्डिनेशन कमेटी ने फैसला किया कि उस के निमंत्रण पर आए देश भर से पहुंचे प्रतिनिधि बाहर खुले लॉन में अपनी मीटिंग करेंगे। आंदोलन तोड़ने पर आमादा लोगों ने मोर्चे की उस मीटिंग में भी विघ्न डालने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। कोऑर्डिनेशन कमिटी के नेतृत्व में संपन्न हुई इस राष्ट्रीय बैठक में मोर्चे के आगामी कार्यक्रम के बारे में निर्णय लिए गए। हालांकि इस प्रकरण से आंदोलन के विरोधियों और गोदी मीडिया को मोर्चे के दोफाड़ होने का दुष्प्रचार करने में बहुत मदद मिली फिर भी मोर्चे की एकता को बनाए रखने के लिए हमने चुप्पी बनाए रखी।

लेकिन हमें यह देख कर बहुत हैरानी हुई कि इन नेताओं ने चंडीगढ़ से श्री  बलबीर सिंह राजेवाल के नाम से एक बयान जारी कर मोर्चे की कोऑर्डिनेशन कमिटी की भंग करने और अपने आप को संयुक्त किसान मोर्चा घोषित करने की हास्यास्पद हरकत की है। इस बयान में 21 मार्च को लखीमपुर खेरी में मोर्चे की एक राष्ट्रीय मीटिंग बुलाने का भी जिक्र किया गया है जबकि संयुक्त किसान मोर्चा इस दिन देशभर में इस मुद्दे पर रोष दिवस मनाने का फैसला कर चुका है।

संयुक्त किसान मोर्चा एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि मोर्चे में किसी तरह की कोई फूट नहीं है। बैठक में विघ्न डालने वाले सर्वश्री बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी सहित “संयुक्त समाज मोर्चा” और “संयुक्त संघर्ष पार्टी” बनाने वाले किसान संगठनों और नेताओं से संयुक्त किसान मोर्चा का कोई संबंध नहीं है। हम अब भी उनसे अपील करते हैं कि वे ऐसी किसी भी हरकत से बाज आए जिससे किसानों की इस ऐतिहासिक एकता को खतरा पहुंचता है। हम सभी किसान संगठनों को आगाह करना चाहते हैं कि 21 मार्च की लखीमपुर खीरी की बैठक में हिस्सा लेने वाले किसी भी संगठन या नेता पर संयुक्त किसान मोर्चा में अनुशासन की कार्यवाही की जाएगी।

किसान एकता जिंदाबाद!

जारीकर्ता -

डॉ दर्शन पाल, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, शिवकुमार शर्मा (कक्का जी), युद्धवीर सिंह, योगेंद्र यादव

                          संयुक्त किसान मोर्चा

         ईमेल: samyuktkisanmorcha@gmail.com

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